वर्ष 2019 के प्रारम्भ में जांचकर्ता ने निम्नलिखित स्थानों पर आयोजित 7 जल्लीकट्टू कार्यक्रमों पर जांच की- अवनीपुरम, पलामेडु, अलंगनुल्लूर (ज़िला मदुरई), कीलापनायुर, विरलीमलाई (पोडुकोट्टई ज़िला) तथा उलंगमपट्टी (ज़िला डिंडुगुल) एवं अलगुमलाई (ज़िला त्रिपुर)।

बैल स्वयं को खतरे में पाकर लोगों से दूर भागने का प्रायस करते हैं, यह बैलों का प्रकृतिक स्वभाव है, इस जांच ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मन बहलाने का यह हिंसक तरीका बैलों के उस प्रकर्तिक स्वभाव का फ़ायदा उठाकर उनको खतरनाक स्थितियों में डाल देता है। फोटोग्राफी एवं वीडिओग्राफी के रूप में एकत्र किए गए यह सबूत इस बात की गवाही देते हैं कि जल्लीकट्टू के दौरान बैलों को नुकीली छड़े चुभोई गयी, डंडों से पीटा गया, लोग उनके ऊपर कूद गए, नाक की रस्सी से घसीटा गया, मारा गया व अन्य हिंसक व क्रूर तरीकों से यातनाएं दी गयी ।

जल्लीकट्टू आयोजन से पहले वाली रात यानि 16 घंटों से लाईन में खड़े भूखे एवं प्यासे बैलों को बिना किसी शेड, पानी एवं भोजन के जबरन जल्लीकट्टू में भाग लेने के लिए मजबूर किया गया। उन्हे नाक में बंधी दर्दनाक रस्सी से पकड़कर खींचा गया जिससे उनकी नाक छलनी हो गयी व खून बहने लगा, उनमे से बहुत से बैल आयोजन के बाद थकावट एवं प्यास से बेहोश ही गए।

कानून भी इन बैलों की रक्षा करने में विफल साबित हुआ है

बैलों के लगातार मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित होना कई तरह के कानूनों का स्पष्ट उलंघन है।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान में बताए गए तथ्य “प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है की वो पशुओं के प्रति दयालू रहे” को कायम रखते हुए मई 2014 में जल्लीकट्टू आयोजनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। केंद्र सरकार द्वारा पारित “पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960’ में भी पशुओं को बेवजह पीड़ा पहुंचाना गैर कानूनी माना गया है। जनवरी 2017 में तमिलनाडू राज्य सरकार द्वारा पारित “पशु क्रूरता निवारण (तमिलनाडू संशोधन) अधिनियम 2017” में भी राज्य सरकार में जल्लीकट्टू आयोजनों के संबंध में इसी प्रकार के नियमों की बात कही गयी है।

जनवरी 2018 में, भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड ने जल्लीकट्टू आयोजनों के संबंध में एक दिशानिर्देश जारी कर तमिलनाडू के अधिकारियों को सलाह दी थी की उस दिशानिर्देशों को राज्य के समस्त प्राधिकारियों के साथ सांझा किया जाए।

“तामिलनाडु पशु क्रूरता निवारण (जल्लीकट्टू आयोजन) नियम 2017” तथा “भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड” के 2018 के दिशानिर्देशों का खुलेआम उलंघन हो रहा है।

जल्लीकट्टू के दौरान लगातार हो रही घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि कोई भी नियम जल्लीकट्टू आयोजकों एवं बैलों के प्रति क्रूरता करने वालों को किसी प्रकार की सज़ा या दोष का जिम्मेदार नहीं ठहरा सका है। कानून की यही कमजोरी लोगों को बैलों पर क्रूरता करने और इन्सानों को नुकसान पहुँचाने के लिए प्रेरित करती है।

जांच के दस्तावेज़ एवं बैलों पर देखी गयी क्रूरता के सबूत यह साबित करते हैं कोई भी कानून बैलों को जललीकट्टू में मिलने वाली क्रूरता से बचा नहीं सका है।

वीडियो

ऐसा कभी देखा नहीं है कि जल्लीकट्टू में इस्तेमाल होने वाले बैल मौज मस्ती के लिए भी दौड़ करते हैं। इन डरे सहमे बैलों का भारी भरकम शरीर इस तरह के दौड़ों के अनुकूल नहीं है लेकिन दर्शक उनको शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित कर उकसाते हैं कि वह डर एवं भय से तेज़ी से दौड़ें। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जल्लीकट्टू जैसी बैलों की क्रूर दौड़ों एवं अन्य तरह के प्रदर्शनों जैसे सर्कस में उनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है क्यूंकि इन सबमे क्रूरता निहित है। आप जल्लीकट्टू से संबन्धित वीडिओ एवं फोटो देखकर ही अंदेशा लगा सकते हैं कि यह खेल जानवरों के लिए कितना औचत्यहीन है। जल्लीकट्टू खेल में बैलों को मारा पीटा जाता है, मुंह से काटा जाता है व नुकीले हथियार चुभोए जाते हैं ताकि वह इन सबसे भयभीत होकर शोर शराबा करती दर्शकों की भीड़ के बीच से भाग सकें और भागने के दौरान भीड़ भी उन बैलों को चोट पहुंचाती है।

काफी सारे सबूत यह साबित करते हैं कि कोई भी कानून जल्लीकट्टू के दौरान बैलों के साथ होने वाली क्रूरता को रोक नहीं सका है या भाग लेने वाले मनुष्यों को चोट या मृत्यु से बचा नहीं सका है। जबसे “पशु क्रूरता निवारण (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम पारित किया गया था, जल्लीकट्टू में होने वाली घटनाओं के तहत अब तक कम से कम 43 मनुष्यों (जिसमे 11 दर्शकों थे), 14 बैल और एक गाय की मृत्यु हो चुकी है।

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जानबूझकर तड़फाये गए बैल – डरे सहमे जानवर हैं – अमानवीय है। जल्लीकट्टू के दौरान प्रतिभागियों ने इन बैलों को लाठी डंडों से मारा, दरांती और छुरा चुभोया, थप्पड़ घूंसे मारे, उनकी पुंछ को मुंह से काटा और उनके ऊपर कूद गए। कई बैल टूटी हड्डियों और गंभीर चोटों के साथ संघर्ष करते हैं व थकावट एवं निर्जलीकरण के चलते बेसुध होकर गिर जाते हैं और यहां तक कि मर भी जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि जल्लीकट्टू या अन्य दौड़ों के दौरान बैलों का इस्तेमाल करना उनको डराना, उकसाना, चोटिल करना, यातनाएं देना और अपनी जान बचाने के लिए भागना – स्वाभाविक रूप से क्रूर है, और इसलिए देश की इस सर्वोच्च अदालत ने वर्ष 2014 में फैंसला सुनाते हुए किसी भी तरह के प्रदर्शन में बैलों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन इस प्रतिबंध, जन आक्रोश व पशु सुरक्षा कानून के बावजूद इन बैलों पर यातनाएं और दुर्व्यवहार आज भी जारी है।

अगर आपको विश्वास नहीं तो नीचे दिये गए चित्रों पर नजर डालें :

चोटें और मौतें

जल्लीकट्टू की घटनाओं से गंभीर चोटें आती हैं, जिनमें टूटी हुई हड्डियां और यहां तक कि मनुष्यों की मौत के साथ-साथ बैल भी शामिल हैं। 11 दर्शकों सहित कम से कम 43 मनुष्य; 14 बैल; पीसीए (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 2017 के तहत जल्लीकट्टू को फिर से अनुमति दिए जाने के बाद से एक गाय को मार दिया गया है। वास्तविक संख्या अधिक होने की संभावना है। समाचार रिपोर्टों में घटनाओं के दौरान होने वाली चोटों से होने वाली अंतिम मानव मृत्यु को कवर नहीं किया जा सकता है, और वे निश्चित रूप से हमेशा यह नहीं जानते हैं कि बैल क्या सहन करते हैं।

जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगना चाहिए

तमिलनाडू राज्य कानून, बैलों के प्रति जानबूझकर हो रही क्रूरता को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। जल्लीकट्टू के दौरान जिन बैलों के साथ धक्कामुक्की, मारपीट, क्रूरता, दुर्व्यवहार किया जाता है वो शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही तरह से प्रताड़ित होते हैं। जल्लीकट्टू पर लगे प्रतिबंध को पुनः बहाल किया जाना चाहिए ताकि बैलों को इस क्रूरता एवं अत्याचार से मुक्ति तथा इन्सानों को दुर्घटनाओं एवं मौतों से बचाया जा सके।

कार्यवाही करें

जल्लीकट्टू पर की गयी हालिया जांच साबित करती है कि बैलों को क्रूरता से बचाने वाला कानून विफल साबित हुआ है 

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  • Edappadi K. Palaniswami
बोल्ड लैटर में लिखे स्थानों को भरना अनिवार्य है।
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